ब्रह्म-विहार
मनुष्य एक अद्भुत प्राणी है। उसके स्वभाव में अच्छे, बुरे, शुभ और अशुभ दोनों का ही सम्मिश्रण है। उसमें संत की सी सात्विक निर्मलता भी है और साथ ही दानव की सी दूषित प्रवृत्ति भी। कब, कैसे, कौन सी प्रवृत्ति उभर कर उस पर हावी हो जाय - यह कहा नहीं जा सकता । इन दोनों विरोधी शक्तियों के कारण मानव एक ओर सद्गुणों का आगार हो सकता है, तो दूसरी ओर अशुभ, अकुशल और दुष्ट कार्यों को संपन्न करने में समर्थ भी। जो व्यक्ति संत बन कर जन-जन के हितकारी कार्य करके आर्य बनना चाहते हैं, वे प्रयत्नपूर्वक इन आसुरी प्रवृत्तियों से बच कर दैवी गुणों को धारण कर लेते हैं। मनुष्य पृथ्वी के अंदर गड़े हुए कीमती हीरे आदि को खोद कर निकालने में अथक शारीरिक और मानसिक कष्ट उठाता है, यहां तक कि कभी अपनी जान भी गवां बैठता है परंतु अपने ही भीतर सुसुप्त दैवी शक्ति को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील होना नहीं चाहता, जबकि इसके लिए केवल संकल्प, वीर्य और धैर्य की ही आवश्यकता है। प्रयत्नशील हो तो निर्धन से निर्धन और नितांत अपढ़ व्यक्ति तक आध्यात्मिक उंचाइयां प्राप्त कर सकता है। मानव में उसे अधोगति की ओर ले जाने वाले जो दोष हैं, उनम...