विपश्यना प्रश्नोत्तर
प्रश्न:- आपने बताया है कि जब पुराने संस्कार निकलेंगे तो संवेदना पैदा करके ही निकलेंगे । ऐसा क्यों होता है? यदि यह कुदरत का कानून है तो कैसे जांचें और कैसे मानें? उत्तर:- क्योंकि संस्कार जब बनते हैं तब संवेदना के साथ ही बनते है । जिस प्रकार की संवेदना से कोई संस्कार बना है, बाहर निकलेगा तो उसी प्रकार की संवेदना के साथ निकलेगा । एक उदाहरण से समझें - कि कोई कांटा चुभा, कांटा चुभा तो दर्द हुआ । अब उस कांटे को बाहर निकलना है तो सूई चुभा करके ही उसको बाहर निकलेंगे, तब भी उतना ही दर्द होगा । चुभन के वक्त जो दर्द हुआ था निकालने के वक्त भी वही दर्द होगा। इसी प्रकार संस्कार बनाते वक्त जिस प्रकार की संवेदना हुई थी, उसको निकलते वक्त उसी प्रकार की संवेदना होगी, ऐसा नियम है । प्रश्न:- आप अपने प्रवचनों में बतलाते हैं कि कर्मफल संवेदना के रूप में आता है । यह बात समझ में नहीं आई । क्योकि संवेदनाएं तो शरीर का स्वभाव हैं, कई कारणों से आ सकती हैं । तो फिर उनको पिछले कर्मो का फल क्यों मानें? क्या यह मानने की बात है ? उत्तर:- जरूरी नहीं है। सारी संवेदनाएं कर्मसंस्कारों की घोतक नही...